"आज ज़रा बस से शराबख़ाने की गली चलूँ।"
ऐसे हल्के मन से काम से लौटते वक़्त बस में चढ़ा। यह दिन ज़िंदगी के सबसे ज़्यादा दिल पर भारी दिनों में से एक बनने वाला है, उस वक़्त के KAZUKIN को पता ही नहीं था।
बस से उतरे कुछ मिनट हुए। "अरे…?" बटुआ नहीं है। सच में? बैग देखकर और भी पीला पड़ गया। ज़िप पूरी खुली है। यह तो अपराध-स्थल है।
"नहीं नहीं, शांत हो जा।" बैग उलट दिया। जेबें टटोलीं। जैकेट देखा। पतलून देखी। दिल तक खँगाल डाला। ……जो नहीं है, वह नहीं है।
फ़ोन के मेले और निराशा 50% का 8 बजे
बस के सिवा कुछ नहीं। पर रास्ते में भी हो सकता है। सोच में बस के भीतर ही आता है। पर बीच में गिरा हो, यह भी संभव है। सोचते रहने से कुछ नहीं होगा। तुरंत उलटी दिशा की बस में कूद पड़ा, जिस स्टॉप से चढ़ा था वहाँ तक लौटा। इस बीच, बस कंपनी को फ़ोन, पुलिस को फ़ोन, बैंक को फ़ोन, कार्ड कंपनी को फ़ोन। पूरा फ़ोन का मेला है।
पुलिस ने रिपोर्ट संख्या बताई। "रिपोर्ट संख्या ○○ है।" जी। धन्यवाद। ……पर दिल कहीं और है। बैंक की ऑपरेटर ने नरमी से कहा, "फ़िलहाल किसी ग़लत इस्तेमाल की पुष्टि नहीं हुई है, निश्चिंत रहिए।" धन्यवाद…। बस उसी एक बात से थोड़ी राहत मिली।
"8 बजे लौटेगी" बस कंपनी ने कहा। "वह बस अभी अगले रूट पर चल रही है।" "8 बजे के आसपास लौटेगी, उस वक़्त बटुआ न मिले तो……मान लीजिए कि नहीं था।" ……उस एक बात में काफ़ी दम था। उम्मीद 50%। निराशा 50%। इसी हालत में 8 बजे का इंतज़ार करना पड़ा।
बटुआ न मिलने की मान्यता पर चलना
इंतज़ार के दौरान भी रुकना नहीं हुआ। माईनंबर कार्ड बंद कराओ। बैंक कार्ड बंद कराओ। क्रेडिट कार्ड बंद कराओ। दिमाग़ में "ड्राइविंग लाइसेंस दोबारा बनवाना होगा…।" "सारे कार्ड फिर से बनवाने होंगे…।" "पॉइंट कार्ड कितने हैं…।" "Saint Marc के शेयरधारक लाभ का क्या होगा?" बिल्कुल पूरा ज़िंदगी की काग़ज़ी कार्रवाई वाला RPG है।
7:30 बजे। फ़ोन देखा। बस कंपनी से कॉल। ……क्या? ……कहीं? जल्दी से वापस मिलाया। "हेलो…KAZUKIN बोल रहा हूँ…।" तब फ़ोन के उस पार से। "अरे~! बटुए वाले आप हैं ना।" "मिल गया है!"
……धन्य・・・・धन्य・वा・द・~~~~!!!!!!यार। भावना के हिसाब से, मृत्युदंड सुनाए जाने के 5 सेकंड बाद बेगुनाही तय हो गई, उतने स्तर की। इसी ज़ोर से। सचमुच बच गया। ख़तरा टल गया। बटुए से ज़्यादा उसके भीतर रखे ड्राइविंग लाइसेंस और कार्ड सोचो तो सचमुच ठंडा पसीना ही आया।
इंसान को पहली छाप से नहीं परखना चाहिए
वैसे। बस में बग़ल में चुड़ैल जैसे लंबे नाख़ून वाली दो लड़कियाँ बैठी थीं। बटुआ नहीं है, पता चलते ही, "कहीं……इस वक़्त वे लड़कियाँ पी तो नहीं रही होंगी……।" ऐसा पल भर के लिए सोच बैठा। ……माफ़ कीजिए। सचमुच माफ़ कीजिए।
शायद। नहीं, बल्कि उन्हीं लड़कियों ने उठाकर ड्राइवर तक पहुँचाया हो, यह भी संभव है। आख़िर पता नहीं चला कि किसने पहुँचाया। पर, किसी अनजान ने भलाई से पहुँचाया, यह बात निश्चित है।
अगर चमत्कार से उस इंसान से दोबारा मिल जाऊँ। नक़द देना उलटा अपमान हो सकता है, इसलिए उपहार-कार्ड या मिठाई, कुछ धन्यवाद देना चाहता हूँ। …ऐसा सोचता हूँ, पर "बस बग़ल में बैठे इंसान को कैसे खोजूँ" वाली समस्या सबसे बड़ी दीवार है (हाहा)।
सारांश
बटुआ गिराकर समझ आया। ज़िप बंद रखो। कार्ड बंद कराना उम्मीद से ज़्यादा मुश्किल है। और सबसे बढ़कर, दुनिया में सचमुच दयालु लोग हैं।
नाम भी न जानने वाले कोई। पहुँचाने वाले। मदद करने वाली बस कंपनी के सब लोग। पुलिस वाले। बैंक और कार्ड कंपनी के ऑपरेटर सब। सचमुच बहुत धन्यवाद। अनजान लोगों की गर्मजोशी ने दिल की गहराई से बचा लिया, ऐसा दिन था। ……फिर भी। कुछ समय तक हर 30 सेकंड में बटुआ जाँचने वाली बीमारी तो ठीक होने वाली नहीं (हाहा)।
善意の温かみ、いいよね
KAZUKIN स्टाइल रेटिंग
- 💦 दिल पर बोझ ★★★★★ (ज़िंदगी के टॉप स्तरों में)
- 📞 फ़ोन के मेले की थकान ★★★★☆ (बैंक, पुलिस, कार्ड कंपनी सब जुटे)
- 🙏 अनजान की भलाई ★★★★★ (सचमुच बचा लिया)
- 😅 अपने आचरण पर पछतावे लायक़ बातें ★★★★☆ (दो लड़कियों पर पल भर शक कर बैठने की बात)
- 🔒 ज़िप बंद करने की जागरूकता ★☆☆☆☆ (अगली बार पक्का)
*यह लेख निजी अनुभव और राय है। इसमें आए बस कंपनी और संबंधित सभी लोगों के प्रति आभार के साथ इसे दर्ज किया गया है।